कथा
देवी मायके आती हैं। बंगाल में वे अपने चार बच्चों — लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय — के साथ पाँच दिन के लिए माता-पिता के घर आई बेटी हैं, और दसवाँ दिन उनका लौटना है। इसीलिए आखिरी दिन जीत नहीं, बिछोह है।
मूर्ति हर साल नई बनती है, पुआल और बाँस के ढाँचे पर नदी की मिट्टी चढ़ाकर, और परंपरा कहती है कि उस मिट्टी में एक मुट्ठी वेश्या के दरवाज़े की हो, उसी के हाथ से दी हुई। आँखें सबसे अंत में बनती हैं, महालया की भोर में, और चित्रकार उन्हें सीधे देखे बिना बनाता है।
कहा जाता है कि रावण से युद्ध से पहले राम ने देवी को बेवक़्त जगाया था, इसीलिए शरद की इस पूजा को अकाल बोधन कहते हैं। कोलकाता की दुर्गा पूजा 2021 में यूनेस्को की सूची में आई, भारत का पहला त्योहार जो उसमें दर्ज हुआ।