कथा
वृंदा अपने पति जालंधर के प्रति निष्ठावान थी, और उसी निष्ठा ने उसे अजेय बना रखा था। उसे तोड़ने के लिए विष्णु ने जालंधर का रूप लिया, और जब वृंदा को यह समझ आया तो उसने उन्हें पत्थर हो जाने का शाप दिया। उन्होंने शाप स्वीकार किया, शालिग्राम बने, और उसे तुलसी का रूप दिया — ताकि उनके किसी भी अर्पण में उसके बिना पूर्णता न हो।
आज का विवाह वही वचन निभाया जाना है। आँगन की तुलसी का विष्णु से पूरे विधि-विधान से विवाह होता है, और घर अपनी ही बेटी का कन्यादान करता है।
इसीलिए हर वैष्णव अर्पण पर तुलसी का पत्ता रहता है, और यह पौधा ज़मीन में नहीं, ऊँचे सजे हुए चौरे में लगाया जाता है।
