कथा
एक तिथि पर तीन घटनाएँ: नेपाल की तराई के लुंबिनी में राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म, पैंतीस वर्ष बाद बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उनका बोध, और अस्सी की उम्र में कुशीनगर में उनका परिनिर्वाण। थेरवाद परंपरा तीनों को वैशाख पूर्णिमा पर रखती है, और बुद्ध के जन्म की कथा कहती है कि माता माया ने लुंबिनी के उपवन में साल की टहनी थामी और नवजात ने सात कदम चले।
श्रीलंका में पूरा देश लालटेनों और मुफ़्त भोजन का उत्सव बन जाता है। हर सड़क पर बुद्ध के पूर्वजन्मों (जातक) के रोशन दृश्यों का पंडाल, हर चौराहे पर राहगीरों को चावल, चाय और आइसक्रीम देती दानसाला, और हर घर पर काग़ज़ की लालटेनें (वेसाक कूडु) लटकी।
